मिली गांधी की पांचवीं पीढ़ी : कैसे पहुंचा उनका परिवार साउथ अफ़्रीका में.

गांधीडरबन में गांधी प्रवासी भारतीयों के साथ

आज मोहनदास करमचन्द गांधी की 150वीं जयंती है. वो महात्मा बने, प्यार से बापू भी कहलाये और उन्हें अंत में राष्ट्रपिता होने का सम्मान भी दिया गया.

गांधी अहिंसा और सत्याग्रह के पैग़ंबर थे. अंग्रेज़ी राज को घुटने टिकाने वाले उनके इस मंत्र का जन्म साउथअफ़्रीका में हुआ था.

आज भारत में शायद कम लोगों को इस बात का अंदाज़ा होगा कि साउथ अफ़्रीका में, जहाँ गांधी ने अपनी जवानी के 21 साल गुज़ारे, उनकी विरासत बची है या नहीं. उनका नाम यहाँ लिया जाता है या नहीं?

कुछ समय पहले हम यही जानने के लिए भारत से यहाँ आये.

गांधी
यही वो घर है जहां गांधी जी ने अपने सत्याग्रह और अहिंसा से जुड़े विचार विकसित किए.

डरबन और जोहानसबर्ग जैसे बड़े शहरों में गांधी को भुलाना आसान नहीं है. यहाँ के कुछ चौराहों और बड़ी सड़कों पर गांधी का नाम जुड़ा है. उनकी प्रतिमाएं लगी हैं और उनके नाम पर संग्रहालय बने हैं जहाँ इस देश में गुज़रे समय को क़ैद कर दिया गया है.

गांधी 1893 में साउथ अफ्रीका आये और 1914 में हमेशा के लिए भारत लौट आए.

शायद इस बात पर इतिहासकारों की सहमति हो कि इस देश में गांधी जी की सबसे अहम विरासत डरबन के फ़ीनिक्स सेटलमेंट में है जो भारतीय मूल के लोगों की एक बड़ी बस्ती है.

गांधी
Image captionजोहानसबर्ग का गांधी चौक जहाँ कभी गांधी का दफ़्तर होता था.

फ़ीनिक्स सेटलमेंट में गांधी ने 1904 में 100 एकड़ ज़मीन पर एक आश्रम शुरू किया था जहाँ, उनकी पोती इला गांधी के अनुसार, गांधी जी की शख़्सियत में भारी परिवर्तन आने लगा.

सत्याग्रह के आइडिया से लेकर सामूहिक रिहाइश, अपना काम खुद करने की सलाह हो और पर्यावरण संबंधी क़दम (जैसे मिट्टी के बर्तनों का इस्तेमाल और जल संरक्षण) जैसे विचार फ़ीनिक्स सेटलमेंट के गांधी आश्रम में जन्मे और पनपे.

गांधी इस देश में एक बैरिस्टर की हैसियत से सूट और टाई में आये थे. उनके क़रीबी दोस्तों में गोरी नस्ल और भारतीय मूल के लोग अधिक थे.

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जोहानसबर्ग के इस जेल में गांधी और मंडेला दोनों क़ैद रह चुके हैं.

कहा जाता है कि आश्रम में बसने से पहले उनका लाइफ़ स्टाइल अंग्रेज़ों जैसा था. खाना वो काँटा छुरी से खाते थे.

वो काली नस्ल की स्थानीय आबादी से दूर रहते थे. इसी कारण उनके कुछ आलोचक उन्हें रेसिस्ट भी कहते हैं.

गांधी को नस्लवादी क्यों कहते थे लोग?

लेकिन 78 वर्षीया उनकी पोती इला गांधी के अनुसार लोगों को ये नहीं भूलना चाहिए कि गांधी साउथ अफ़्रीक़ा जब आये थे तो उनकी उम्र केवल 24 वर्ष थी.

इंग्लैंड में वकालत की पढ़ाई तो कर ली थी लेकिन व्यावहारिक जीवन में पूरी तरह से क़दम नहीं रखा था.

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इला गांधी का जन्म इसी आश्रम में 1940 में हुआ था और इनका बचपन यहीं गुज़रा. तेज़ बारिश के बावजूद वो खुद गाड़ी चलाकर हमसे मिलने आयी थीं.

हमने गांधी के ख़िलाफ़ नस्ली भेदभाव के इलज़ाम के बारे में पूछा तो उन्होंने कहा, “बापू के उस युवा दौर के एक दो बयान को लोगों ने कॉन्टेक्स्ट से हटाकर देखा जिससे ये ग़लतफ़हमी हुई कि उनके विचार नस्ली भेदभाव वाले हैं.”

अपनी बात ख़त्म करने के तुरंत बाद हमें वो आश्रम के उस कमरे में ले गयीं जो एक ज़माने में परिवार का रसोई घर होता था. लेकिन अब ये पूरा घर एक संग्रहालय है.

उन्होंने दीवार पर लगे गांधी जी के कुछ बयानों की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, “ये देखिये, इस बयान को लेकर बापू को रेसिस्ट समझा गया. लेकिन इनके साथ एक-दो और बयान पर नज़र डालिये जिससे लगेगा कि वो नस्लपरस्त बिलकुल नहीं थे”

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इला गांधी महात्मा गांधी के चार बेटों में से दूसरे बेटे मणिलाल गांधी की बेटी हैं.

वो आज एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और गांधी की एक ज़बर्दस्त शिष्या भी. वो एक रिटायर्ड प्रोफेसर हैं और पूर्व सांसद भी.

इला गांधी ने, जो सात साल की उम्र में बापू की गोद में खेल चुकी हैं, गांधी के शांति मिशन का चिराग़ साउत अफ़्रीका में अकेले ज़िंदा रखा हुआ है.

अपनी मृत्यु से पहले उनकी बड़ी बहन सीता धुपेलिया गांधी के विचारों का प्रचार-प्रसार किया करती थीं. उनकी बेटी कीर्ति मेनन और बेटे सतीश गांधी परिवार की चौथी पीढ़ी हैं.

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