मोदी सरकार की नमामि गंगे योजना बेअसर : आखिर समस्या क्या है?

गंगा में ऑक्सिजन की मात्रा लगातार घट रही है. पिछले चार साल में गंगा का बैक्टिरिया 58 फ़ीसदी बढ़ा है.

गंगा की सफ़ाई के लिए शुरू किए गए ‘नमामि गंगे’ की डेडलाइन 2020 है, लेकिन अब तक इसके 10 फ़ीसदी प्रोजेक्ट भी पूरे नहीं हुए.

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट है कि मोदी सरकार का कहना है कि उन्होंने गंगा की सफ़ाई के लिए 21,000 करोड़ का नमामि गंगे अभियान शुरू किया है. केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने दावा किया है कि 2020 तक गंगा की 70-80 फ़ीसदी सफ़ाई पूरी हो जाएगी.

लेकिन ज़मीन पर इसकी हक़ीक़त ये है कि सीवेज का पानी रोकने के 10 फ़ीसदी प्रोजेक्ट ही पूरे हुए हैं. इसके लिए 11 हज़ार करोड़ रूपए दिए गए थे.

सरकार के पास अपने दावे पूरे करने के लिए एक साल का वक़्त बचा है. 151 नए घाट बनाये जाने थे, लेकिन अभी तक 36 ही बने हैं.

एनजीटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि 2017 तक इस प्रोजेक्ट पर 7304.64 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं, लेकिन केंद्र और राज्य सरकारें गंगा की सेहत नहीं सुधार सके.

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आपको शाकाहारियों का देश चाहिए ,क्या ?

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस लोकुर और दीपक गुप्ता की एक बेंच उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे जिसमें मांग की गई है कि सभी प्रकार के मांस(बीफ़, मछली, पोर्क और मुर्गे) और उनसे संबंधित उत्पादों के निर्यात पर बैन लगा दिया जाए, चाहे सरकारी आयात हो या प्राइवेट कंपनियों का आयात हो.

याचिका में दलील दी गई है कि मांस और चमड़े का व्यापार समाज विरोधी और बर्बर है और विदेशी मुद्रा के लिए देश बहुत बड़ी कीमत चुकाता है.

जस्टिस लोकुर ने पूछा कि क्या आप पूरे देश को शाकाहारियों से भर देना चाहते हैं?

द हिंदू में छपी इस ख़बर के मुताबिक़ हालांकि बेंच ने सुनवाई के लिए याचिका स्वीकार कर ली.

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